Friday, April 10, 2009

प्यार तो भी फसाना होता है

प्यार तो भी फसाना होता है
लव खामोश , दिल में अफसाना होता है
रुखसत चैन आँखों की नींद
वो भी याद रुलाना होता है
प्यार तो भी फ़साना होता है
लव खामोश दिल में अफसाना होता है
इतना भी न कह पाना की
ये प्यार और दिल हर पे न आना होता है
लेकिन ये भी तो गुजरा ज़माना होता है
प्यार तो फ़साना होता है
लव खामोश दिल में अफसाना होता है
इस दिल की अवाज कभी- कभी
दीये में जलते लौ की तरह परवाना होता है
पता नहीं था की ऐसा भी खुदगर्ज़ जमाना होता है
प्यार तो भी फ़साना होता है
लव खामोश दिल में अफसाना होता है
पत्थर की बूट की तरह मायूस ये akash
अपने पर मर जाना होता है
कौन जाने खुदा की पयाम भी
खुशी में भी रुलाना होता है
प्यार तो भी फसाना होता है

Thursday, April 9, 2009

जुल्फें ऐसी क्यों बिखरी

जुल्फें ऐसी क्यों बिखरी
शायद हवा ने शरारत की होगी
छिपा होगा इसमे मुखड़ा चाँद का
शायद उसने भी रौशनी ली होगी
ये जुल्फ जब हो चेहरे पर
कुछ सेहरे से लगने लगे , एक तो मदमस्त मौसम
ऊपर से ये नजारा , हम देख कर यों ही बहकने लगे
खुद को परेशां होगा ये पवने किस से हम टकरा गए
ये सावन का मौसम , हम भी बल खा गए
खिलाता चमन है उनका चेहरा
सुर्ख होंठ कजरारे नयना ,
जिसे देख शर्मा गई आइना ,
नयना उनकी है देखने में है इतनी भोली
लगता है सात समुद्र की हमजोली
सच पूछो खुदा का बनाया गया एक साज है
उनकी अपनी एक अलग ही राग है
जुल्फें ऐसी क्यों बिखरी
शायद हवा ने शरारत की होगी
छिपा होगा इसमे मुखड़ा चाँद का
शायद उसने भी रौशनी ली होगी

मेरी रुखसत रूह , जरा मेरे यार के करीब कौन आये बता दे

रूह - बरसों की बनी प्यार भरी तस्वीर , अश्क की लकीर नज़र आए

बनी है है वह बुत, कितनों को जंजीर नजर आए

कह न सकी होगी वह लफ्ज , आज उसने मजार पर कह डाली

जो दूरी उसमे और मुझमे थी , आज करीब नजर आए

तुर्बत पर पङी मिटटी क्यों फ़कीर नज़र आए

बस मरहूम याद मेरी , उसको दर्द -ऐ- इरशाद का एह सास जताए

मजार पर जलती ये समां कितनी गंभीर नजर आए

इश्क वह मुझसे करके दूर हो जाए

इतनी शायद उसकी याद हो जो मुझे , उसकी तक़दीर नज़र आए

मन में चलती यादों की वो तीर कितनी ज़मीर नज़र आए

बगल में बैठा शख्श रकीब नज़र आए

मेरी रुखसत रूह मेरे यार के करीब कौन आए

Wednesday, April 8, 2009

जुल्फें ऐसी क्यों बिखरी

जुल्फें ऐसी क्यों बिखरी

शायद हवा ने शरारत की होगी

छिपा होगा इसमे मुखरा चाँद का

शायद उसने भी रौशनी ली होगी

ये जुल्फ जब हो चेहरे पर

कुछ सेहरे से लगने लगे , एक तो मदमस्त मौसम

ऊपर से ये नजारा , हम देख कर यों ही बहकने लगे

खुद को परेशां होगा ये पवने किस से हम टकरा गए

ये सावन का मौसम , हम भी बल खा गए

खिलाता चमन है उनका चेहरा

सुर्ख होंठ कजरारे नयना ,

जिसे देख शर्मा गई आइना ,

नयना उनकी है देखने में है इतनी भोली

लगता है सात समुद्र की हमजोली

सच पूछो खुदा का बनाया गया एक साज है

उनकी अपनी एक अलग ही राग है

जुल्फें ऐसी क्यों बिखरी
शायद हवा ने शरारत की होगी
छिपा होगा इसमे मुखरा चाँद का
शायद उसने भी रौशनी ली होगी