Wednesday, April 8, 2009

जुल्फें ऐसी क्यों बिखरी

जुल्फें ऐसी क्यों बिखरी

शायद हवा ने शरारत की होगी

छिपा होगा इसमे मुखरा चाँद का

शायद उसने भी रौशनी ली होगी

ये जुल्फ जब हो चेहरे पर

कुछ सेहरे से लगने लगे , एक तो मदमस्त मौसम

ऊपर से ये नजारा , हम देख कर यों ही बहकने लगे

खुद को परेशां होगा ये पवने किस से हम टकरा गए

ये सावन का मौसम , हम भी बल खा गए

खिलाता चमन है उनका चेहरा

सुर्ख होंठ कजरारे नयना ,

जिसे देख शर्मा गई आइना ,

नयना उनकी है देखने में है इतनी भोली

लगता है सात समुद्र की हमजोली

सच पूछो खुदा का बनाया गया एक साज है

उनकी अपनी एक अलग ही राग है

जुल्फें ऐसी क्यों बिखरी
शायद हवा ने शरारत की होगी
छिपा होगा इसमे मुखरा चाँद का
शायद उसने भी रौशनी ली होगी

Friday, April 3, 2009


दिल से रे ----


मैं पहली बार ब्लॉग की दुनिया में कदम रख रहा हूँ । अपनी दिल की कुछ बातें आप से शेयर करना चाहता हूँ । खबरों की दुनिया से कुछ खास लेकर आपके सेवा में जब कभी मौका मिलेगा जरूर उपस्थित हो जाऊंगा । कही और अनकही बातों का लंबा सिलसिला जारी रहने की उम्मीद है । अभी मित्रों बस इतना ही ... ,, ।